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वट पूर्णिमा कब है? 2026 में जानिए सही तारीख,शुभ मुहूर्त, पूजा कि विधि और इस दिन क्या ना खरीदे।

हमारे सनातन धर्म और धार्मिक कलेंडर के अनुसार वट पूर्णिमा का व्रत हर वर्ष ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष कि पूर्णिमा को मनाया जाता है, इस दिन सुहागन महिलाएं वट यानी कि (बरगद) के पेड़ कि पूजा करती हैं, हमारे धर्म ग्रंथो के अनुसार इस दिन जो भी स्त्री बरगद के वृक्ष की पूजा करती हैं तथा यमराज से अपने पति के प्राण वापस लाने वाली माता सावित्री की कथा को पड़ती या सुनती हैं उन महिलाओं की पति की आयु लंबी तथा अच्छे स्वास्थ्य का वरदान मिलता हैं।

वट पूर्णिमा कब है

हमारे हिंदू पंचांग के अनुसार साल 2026 में ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष यानी कि 29 जून 2026 को सुबह 6:12 से लेकर 30 जून को 4:25 तक रहेगा अब सबसे जरूरी है शभ मुहूर्त जो कि (सोमवार) को 29 जून से सुबह 8:50 से दोपहर को 1:45 तक बहुत ही शुभ योग है।

वट पूर्णिमा पर भूलकर भी न खरीदें ये चीजें

अक्सर महिलाएं व्रत की तैयारी में अनजाने में कुछ ऐसी चीज़ें खरीद लेती हैं, जिससे पूजा का फल नष्ट हो जाता है। वट पूर्णिमा के दिन सुहागिन स्त्रियों को इन चीज़ों को खरीदने से बचना चाहिए।

काले या नीले रंग के वस्त्र और चूड़ियाँ: देखिये वट पूर्णिमा सौभाग्य का पर्व है। इस दिन भूलकर भी काले या गहरे नीले रंग के कपड़े, बिंदी या चूड़ियाँ न खरीदें और न ही पूजा में पहनें। इस दिन लाल, पीला, हरा या गुलाबी रंग ही सबसे शुभ माना जाता है।
लोहे या स्टील की धारदार वस्तुएं: व्रत के दिन या उससे एक दिन पहले बाज़ार से सुई, कैंची, चाकू या कोई भी लोहे का सामान नहीं खरीदना चाहिए। यह घर में कलह लाता है।
सफेद रंग की सुहाग सामग्री: पूजा के लिए सिंदूर, चूड़ी या मौली खरीदते समय ध्यान रखें कि उनमें सफेद रंग का मिश्रण न हो। सफेद रंग को इस दिन वर्जित माना गया है।
प्लास्टिक के बर्तन या दोने: बरगद देव की पूजा के लिए सामग्री रखने के लिए प्लास्टिक की प्लेट या कटोरी न खरीदें। हमेशा मिट्टी के दीये, पीतल के बर्तन या बांस की टोकरी का ही इस्तेमाल करें।

वट पूर्णिमा पूजा सामग्री की पूरी लिस्ट 

मुख्य सामग्री: माता सावित्री और सत्यवान की मूर्ति या तस्वीर, बांस का पंखा (बिजना)।
पूजा के लिए: बरगद के पेड़ पर लपेटने के लिए सूत का कच्चा धागा या कलावा (मौली), गंगाजल, शुद्ध जल का लोटा।
श्रृंगार और सुहाग सामग्री: रोली (कुमकुम), सिंदूर, अक्षत (साबुत चावल), हल्दी, मेहंदी, काजल, बिंदी, चूड़ियाँ और लाल चुनरी।
भोग और फल: भीगे हुए चने, मिठाई (पेडा या बरफी), घर में बने आटे के पुए, मौसमी फल (विशेषकर पका हुआ आम, खरबूजा और तरबूज)।
दीपक और सुंगध: मिट्टी का दीपक, गाय का शुद्ध घी, रुई की बत्ती, अगरबत्ती, कपूर और माचिस।
अन्य वस्तुएं: पूजा की थाली, चढ़ाने के लिए कुछ दक्षिणा (सिक्के), और बिछाने के लिए साफ आसन।

वट सावित्री पूर्णिमा की प्रामाणिक पूजा विधि 

बरगद के पेड़ में साक्षात ब्रह्मा, विष्णु और महेश का वास माना जाता है। इसलिए हमारी बताई गई विधि के अनुसार ही पूजा करें। या फिर अपने आसपास के पंडित से सलाह जरूर लें। 

सुबह का स्नान: व्रत के दिन सुबह जल्दी उठकर स्नान करें और नए या साफ सुथरे सुहाग के रंग के वस्त्र (जैसे लाल या पीली साड़ी) पहनें। पूरा श्रृंगार करें।
थाली तैयार करना: ऊपर बताई गई पूजा की थाली में रोली, अक्षत, गीला चना, फल, मिठाई, सूत का कच्चा धागा और जल का लोटा सजा लें।
बरगद की पूजा: किसी वट (बरगद) वृक्ष के पास जाएं। सबसे पहले पेड़ की जड़ में जल का अर्घ्य दें। उसके बाद रोली और अक्षत से तिलक करें।
परिक्रमा और सूत बांधना: अब सूत के कच्चे धागे या मौली को हाथ में लेकर बरगद के पेड़ की 7  या  21 बार परिक्रमा करें और धागे को तने पर लपेटते जाएं। हर परिक्रमा के साथ अपने पति की लंबी उम्र की प्रार्थना करें।
कथा श्रवण: परिक्रमा पूरी होने के बाद वहीं बैठकर सत्यवान और सावित्री की पौराणिक व्रत कथा ज़रूर सुनें या पढ़ें। कथा के बिना यह व्रत अधूरा माना जाता है।
बड़ों का आशीर्वाद: पूजा संपन्न होने के बाद भीगे हुए चने और बयाना (मिठाई व पैसे) अपनी सास या घर की किसी बुजुर्ग महिला को देकर उनके पैर छुएं और आशीर्वाद लें।








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