निर्जला एकादशी व्रत कि कथा 2026: आखिर भीम के कारण क्यों पड़ा इसका नाम भीमसेनी एकादशी? जानिए यह पौराणिक कहानी
सनातन धर्म में ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी को निर्जला एकादशी (Nirjala Ekadashi) कहा जाता है। यह साल की सभी 24 एकादशियों में सबसे कठिन और सबसे महत्वपूर्ण है, क्योंकि इस व्रत में सूर्योदय से लेकर अगले दिन यानि दूसरे दिन (द्वादशी) को सूर्योदय तक पानी की एक बूंद भी आप ग्रहण नहीं कर सकते। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार जो व्यक्ति साल भर में किसी भी एकादशियों का व्रत नहीं रख पाता और यदि ओ सिर्फ निर्जला एकादशी का व्रत पूरी निष्ठा से रख ले, तो उसे पूरे साल की सभी एकादशियों का पुण्य फल एक साथ मिल जाता है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि इस पावन व्रत को भीमसेनी एकादशी या पांडव एकादशी भी क्यों कहा जाता है? पौराणिक निर्जला एकादशी व्रत कथा (Nirjala Ekadashi Vrat Katha in Hindi) पौराणिक कथा के अनुसार, एक बार भीमसेन ने महर्षि वेदव्यास जी के पास जाकर अपनी व्यथा सुनाई। भीम ने कहा हे परम आदरणीय पितामह! मेरे परिवार के सभी लोग माता कुंती, भ्राता युधिष्ठिर, अर्जुन, नकुल, सहदेव और द्रौपदी हर एकादशी को भगवान विष्णु का व्रत रखते हैं और मुझे भी अन्न न खाने की सलाह देते हैं। परंतु मैं भगवान जनार्दन की भक्...

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